Tuesday, March 12, 2019

नेताजी ठेंगा राम और उद्घाटन का शौक

ठेंगा रामजी नेता हैं और नेता उद्घाटन न करे तो वो कैसा नेता। शायद उन जैसे नेताओं के लिए ही भगवद गीता में लिखा गया है

कर्मण्ये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन ।

आप उद्घाटन किये जाऐं, काम समाप्त होगा या नहीं इसकी चिंता न करें। सौभाग्यवश काम पूरा हो गया चाहे वो किसी के भी द्वारा किया गया हो तो आप वापस उसका उद्घाटन करने जरूर पहुँच जायें।

शहर के हालत ऐसे हैं की पुल तो बनते नहीं, शिलान्यास के पथरों की कतारें खड़ी हो जाती हैं। इतने शिलान्यास पत्थरों से ही दो चार पुल बन जाएँ । अगर पुल बन भी जाता है तो उसका अलग अलग नेता अपने रसूख के हिसाब से उद्घाटन कर देते हैं । कई बार तो पुल का उद्घाटन एक नेता बायीं ओर से करता है और दूसरा दाईं और से और एक ही समय पर।

ठेंगा रामजी भी उद्घाटन के बड़े शौक़ीन है। दिन में दो चार उद्घाटन तो कर ही लेते हैं। प्रशासन को सख्त निर्देश हैं की कोई भी काम  शुरू होने से पहले उसका उद्घाटन ठेंगा रामजी के हाथों होना बेहद जरूरी है।  चुनाव नजदीक आने लगते हैं तो उद्घाटन करने की रफ़्तार तेज हो जाती है। कभी कभी तो शिलान्यास के पत्थरों की कमी की वजह से ब्लैकबोर्ड में ही लिख कर उद्घाटन कर दिया जाता है। इससे सहूलियत ये हो जाती है की अगली बार दुबारा उद्घाटन करने में केवल तारीख को बदलना पड़ता है। नेताजी का बस चले तो हर दिन वो सूरज और चाँद के उगने का भी उद्घाटन कर दें।

कभी कभी कर्मचारियों का उतावलापन भी अजीब परिस्थितियां पैदा कर देता है। एक दिन नेताजी के दफ्तर में फ़ोन आया

"नेताजी ठेंगा राम से बात हो सकती है ," फ़ोन के दूसरी तरफ़ एक महिला थी।

फ़ोन ऑपरेटर ने पुछा , "आपको किस सिलसिले में बात करनी है? "

"जी, नेताजी के हाथों उद्घाटन करवाना है ," महिला ने उत्तर दिया।

चुनाव का समय नजदीक है। उद्घाटन शब्द शहद की तरह फ़ोन ऑपरेटर के हलक से उतर गया। शीघ्र महिला के फ़ोन को नेताजी के पर्सनल सेक्रेटरी के पास ट्रांसफर कर दिया गया।

"जी कहिये, कहाँ और क्या उद्घाटन करना है?" सेक्रेटरी साहब ने भरे पान मुँह से पुछा।
"जी हम लोग मैराथन का आयोजन कर रहे हैं और चाहते हैं की नेताजी उसे हरी झंडी दिखाएँ ," महिला ने अपनी बात रखी।
"देखिये उद्घाटन के लिए पार्टी फण्ड में एक लाख रूपये देने होंगे।" सेक्रेटरी बोले।
"सर, एक लाख तो हम दे नहीं पाएंगे।  बजट नहीं है।  अगर नेताजी नहीं आ पाएंगे तो हम नेताजी भुल्लकड़ राम को बुला लेंगे। अब ठेंगा रामजी बड़े नेता हैं मगर हमें भी अपनी हैसियत के हिसाब से चलना पड़ेगा। " चुनाव के मौसम में विपक्ष का नाम लेना दुखती रग को पकड़ने जैसा हो जाता है।
"ठीक है,नेताजी आ जायेंगे।  अब खेल  प्रतियोगिता है और नेताजी खेलों के बहुत शौक़ीन हैं तो उन्हें मैं मना लूँगा।" सेक्रेटरी चुनाव के समय किसी भी जन संपर्क के मौके को गवाना नहीं चाहते।  "लेकिन ध्यान रखियेगा, की कम से कम दस हज़ार की भीड़ होनी चाहिए। और खाने पीने का बढ़िया इंतज़ाम।" सेक्रेटरी साहब अपने गुम्बद जैसी तोंद पर हाथ फेरते हुए बोले।  "और हाँ कूलर का स्टेज पर बंदोबस्त होना चाहिए। " सेक्रेटरी साहब ने शर्तों का चिट्ठा पकड़ा दिया।
"जी सर, चिंता मत कीजियेगा।  भीड़ कम से कम बीस हजार की होगी। हम काफी विज्ञापन कर रहे हैं।" महिला ने जवाब दिया। बीस हजार सुन कर सेक्रेटरी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी।

तय दिन मंत्रीजी अपने सेक्रेटरी और बाकी ताम झाम के साथ उस जगह पहुँच गए जहाँ से मैराथन शुरू होनी थी। वहां पर कहीं दूर दूर तक किसी भी तरह के आयोजन का कोई नामो निशान नजर नहीं आ रहा था। सेक्रेटरी के माथे में पसीना आ गया। नेताजी भी गुस्से में आ गए। सेक्रेटरी ने आयोजकों के नंबर में कॉल  किया मगर हर नंबर पर एक ही मैसेज "यह नंबर पहुँच से बहार है। "

तभी सेक्रेटरी के फ़ोन बजने लगा।  दूसरी ओर से वही महिला की आवाज थी।
"सर, नेताजी पहुँच गए उद्घाटन के लिए। " महिला ने पूछा।
"ये क्या बेहूदा मजाक है?" सेक्रेटरी गुस्से से तमतमा उठे। "आप लोगों को टीम कहाँ है?" इस बीच नेताजी ने भांप लिया की फ़ोन आयोजकों का है और उन्होंने फ़ोन को स्पीकर में डालने का इशारा किया।
"सर, हम माफ़ी चाहते हैं। " महिला ने वापस शालीनता से जवाब दिया। "हम तो मैराथन कराना चाहते थे मगर मैदान मिला ही नहीं। नेताजी ने पिछले चुनावों में वादा किया था की वह जिस आयोजन स्थल पर आप खड़े हैं, वहां एक बड़ा सा खेल का मैदान बनाएंगे। हम आज सवेरे तक भी मैदान का इंतज़ार करते रहे मगर मैदान नहीं बना तो हमें प्रोग्राम को कैंसिल करना पड़ा।"

सेक्रेटरी और नेताजी एक दुसरे का मुँह ताकने लगे। अगल बगल भी अब तक काफी भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी।

नेताजी ने अपने चेलों को इशारा किया और नेताजी की जय जयकार शुरू हो गयी। आनन फानन में एक स्टेज तैयार कर  दिया गया और नेताजी ने खेल के महत्व पर एक लम्बा भाषण भी दे डाला। वो बात अलग है की स्टेज में चढ़ने के लिए नेताजी की कमर को चार लोगों का सहारा लेना पड़ा। जय लोकतंत्र। 

Sunday, January 6, 2019

मिज़ाज राजनीती का



शांतचित्त होकर जनता देख रही है। जनता सुबह उठती है। पानी भरना होता है क्योंकि पानी घंटे भर के लिए ही आता है। साथ ही चाय की केतली में भी उबाल आ रहा होता है। दूध भी पतीले से बहार निकलने को उतावला हो रहा होता है। नाश्ता भी बनाना है और टिफ़िन भी तैयार करने हैं। नहाने के लिए पानी गर्म करना  है। पहले बच्चे तैयार होते हैं फिर बड़े होंगे। जिस दिन बिजली नहीं उस दिन गैस के ऊपर ही पानी गर्म करना पड़ेगा। उसे बाथरूम तक पहुँचाना भी अपने में कला है।

Thursday, January 3, 2019

संसद में बहस


संसद में बहस चलती है, शायद। संसद का जब निर्माण हुआ तो इसमें बैठने की अच्छी व्यवस्था की गई ताकि चुने हुए प्रतिनिधि देश के महत्वपूर्ण विषयों पर बहस कर सकें। मगर संसद के निर्माताओं को कहाँ पता था की यहाँ शब्दों के अलावा हर चीज उड़ाई जाएगी। आजकल जैसे कागज के प्लेन उड़ रहे हैं संसद में। नहीं, नहीं ये कोई सुरक्षा के लिए ड्रोन वगैरह नहीं है, ये तो कागज़ के प्लेन हैं जो हम और आप बचपन में उड़ाते थे। कई बार क्लास में उन प्लेनों को उड़ाने के चक्कर में मास्टरजी की डाँट भी खायी होगी। मगर हमारे नेताओं को कौन डाँटेगा।ऊपर से ऐसी हरकतों पर पब्लिक ताली बजाती हो तो क्या उम्मीद की जा सकती है।

Tuesday, January 1, 2019

हनुमानजी की जाती और हनुमानजी का धर्म

आजकल एक चर्चा जोरों पर है। हनुमानजी की क्या जाती है। बड़ा जटिल विषय है और लोगों की आस्था से भी जुड़ा है। वैसे कहते हैं आस्था से नहीं खेलना चाहिए नहीं तो आप का वो कहते हैं नाश्ता बना दिया जायेगा। शब्द थोड़े साहित्यक नहीं है मगर हकीकत के काफी करीब है।  इसलिए हनुमानजी की जाती के प्रश्न को हम यहीं पर छोड़ देते हैं। मगर फिर भी सवाल उठता है की जाती और धर्म का निर्धारण कैसे होता है?

Saturday, December 29, 2018

शिक्षा है मौलिक अधिकार

इस बार भी चुनावों में गहमा गहमी है। ठेंगा राम और भुल्लकड़ राम, दोनों ने अपनी पुरी ताकत झोंक दी है। हर दिन छोटी बड़ी सभाओं का आयोजन। बड़े बड़े वादे। नागरिकों ने दरख्वास्त की कि शहर के एक क्षेत्र में स्कूल नहीं है तो आनन फानन में दोनों नेताओं ने स्कूल का वादा कर डाला।

चुनाव खत्म हुए। इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन जीता। मगर कहानी को आगे बढ़ाने के लिए हम भुल्लकड़ राम को विजेता घोषित कर देते हैं। वैसे दुबारा याद दिला देता हूँ कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन जीता।

Monday, December 24, 2018

लोन माफ़ी

चुनाव का मौसम है। चुनावी जुमलों की बहार है। नेताजी भुलक्कड़ राम और ठेंगा राम भी बढ़ चढ़कर चुनावी जुमलों की रफ़्तार को कायम रखे हुए हैं। ठेंगा राम ने वादा किया की वो हर तरह के किसानों के ऋण माफ़ कर देंगे। भुलक्कड़ राम कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी वादा कर दिया की वो हर तरह के किसानो का हर तरह का ऋण माफ़ कर देंगे। जनता ने जोर से तालियां भी बजा दी।

इन वादों में हमे अपने लिए आशा की किरण नजर आयी। मगर ऋण की माफ़ी के लिए ऋण  लेना पड़ेगा तो आनन फानन में हम अपने बैंक में पहुँच गएऔर सीधे बैंक की रिसेप्शनिस्ट के सामने विराजमान हो गए।

Sunday, November 25, 2018

Mirzapur web series - A review

Mirzapur, the web series manages to hold the interest but does not leave on a high. It's very gross at times but seems to gel with the story. The two gross moments of blood is when Guddu and Bablu do their first killing and Munna learns to use the shaving knife. The other killings are usually fast and go out of the frame quickly. It creates more blood than fear though the attempt was to create more fear.

The weakest point of the plot is to establish that compounder did an attempt to kill Akhandanand in connivance with Guddu and Bablu. The narrative and plot should have been stronger there especially as it is a turning point in the story. Munna goes there and finds the missed call in compounders mobile and that too after so many days when the mobile would have drained down. And now a days everyone keeps their mobile locked. Munna might be knowing about the unlock sequence but how Makbool can know it. I felt that it should have been a stronger narrative built to establish the relationship. Not sure if I missed but a casual discussion between Akhandanand and Guddu about compounder helping him in Mr Poorvanchal would have built the narrative. Also, it was at odds that there was no mention of touching the tablets by the compounder in some way so that it increases the violence level in Guddu. It comes out only if you are paying too much attention.