Sunday, January 6, 2019

मिज़ाज राजनीती का



शांतचित्त होकर जनता देख रही है। जनता सुबह उठती है। पानी भरना होता है क्योंकि पानी घंटे भर के लिए ही आता है। साथ ही चाय की केतली में भी उबाल आ रहा होता है। दूध भी पतीले से बहार निकलने को उतावला हो रहा होता है। नाश्ता भी बनाना है और टिफ़िन भी तैयार करने हैं। नहाने के लिए पानी गर्म करना  है। पहले बच्चे तैयार होते हैं फिर बड़े होंगे। जिस दिन बिजली नहीं उस दिन गैस के ऊपर ही पानी गर्म करना पड़ेगा। उसे बाथरूम तक पहुँचाना भी अपने में कला है।

Thursday, January 3, 2019

संसद में बहस


संसद में बहस चलती है, शायद। संसद का जब निर्माण हुआ तो इसमें बैठने की अच्छी व्यवस्था की गई ताकि चुने हुए प्रतिनिधि देश के महत्वपूर्ण विषयों पर बहस कर सकें। मगर संसद के निर्माताओं को कहाँ पता था की यहाँ शब्दों के अलावा हर चीज उड़ाई जाएगी। आजकल जैसे कागज के प्लेन उड़ रहे हैं संसद में। नहीं, नहीं ये कोई सुरक्षा के लिए ड्रोन वगैरह नहीं है, ये तो कागज़ के प्लेन हैं जो हम और आप बचपन में उड़ाते थे। कई बार क्लास में उन प्लेनों को उड़ाने के चक्कर में मास्टरजी की डाँट भी खायी होगी। मगर हमारे नेताओं को कौन डाँटेगा।ऊपर से ऐसी हरकतों पर पब्लिक ताली बजाती हो तो क्या उम्मीद की जा सकती है।

Tuesday, January 1, 2019

हनुमानजी की जाती और हनुमानजी का धर्म

आजकल एक चर्चा जोरों पर है। हनुमानजी की क्या जाती है। बड़ा जटिल विषय है और लोगों की आस्था से भी जुड़ा है। वैसे कहते हैं आस्था से नहीं खेलना चाहिए नहीं तो आप का वो कहते हैं नाश्ता बना दिया जायेगा। शब्द थोड़े साहित्यक नहीं है मगर हकीकत के काफी करीब है।  इसलिए हनुमानजी की जाती के प्रश्न को हम यहीं पर छोड़ देते हैं। मगर फिर भी सवाल उठता है की जाती और धर्म का निर्धारण कैसे होता है?

Saturday, December 29, 2018

शिक्षा है मौलिक अधिकार

इस बार भी चुनावों में गहमा गहमी है। ठेंगा राम और भुल्लकड़ राम, दोनों ने अपनी पुरी ताकत झोंक दी है। हर दिन छोटी बड़ी सभाओं का आयोजन। बड़े बड़े वादे। नागरिकों ने दरख्वास्त की कि शहर के एक क्षेत्र में स्कूल नहीं है तो आनन फानन में दोनों नेताओं ने स्कूल का वादा कर डाला।

चुनाव खत्म हुए। इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन जीता। मगर कहानी को आगे बढ़ाने के लिए हम भुल्लकड़ राम को विजेता घोषित कर देते हैं। वैसे दुबारा याद दिला देता हूँ कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन जीता।

Monday, December 24, 2018

लोन माफ़ी

चुनाव का मौसम है। चुनावी जुमलों की बहार है। नेताजी भुलक्कड़ राम और ठेंगा राम भी बढ़ चढ़कर चुनावी जुमलों की रफ़्तार को कायम रखे हुए हैं। ठेंगा राम ने वादा किया की वो हर तरह के किसानों के ऋण माफ़ कर देंगे। भुलक्कड़ राम कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी वादा कर दिया की वो हर तरह के किसानो का हर तरह का ऋण माफ़ कर देंगे। जनता ने जोर से तालियां भी बजा दी।

इन वादों में हमे अपने लिए आशा की किरण नजर आयी। मगर ऋण की माफ़ी के लिए ऋण  लेना पड़ेगा तो आनन फानन में हम अपने बैंक में पहुँच गएऔर सीधे बैंक की रिसेप्शनिस्ट के सामने विराजमान हो गए।

Sunday, November 25, 2018

Mirzapur web series - A review

Mirzapur, the web series manages to hold the interest but does not leave on a high. It's very gross at times but seems to gel with the story. The two gross moments of blood is when Guddu and Bablu do their first killing and Munna learns to use the shaving knife. The other killings are usually fast and go out of the frame quickly. It creates more blood than fear though the attempt was to create more fear.

The weakest point of the plot is to establish that compounder did an attempt to kill Akhandanand in connivance with Guddu and Bablu. The narrative and plot should have been stronger there especially as it is a turning point in the story. Munna goes there and finds the missed call in compounders mobile and that too after so many days when the mobile would have drained down. And now a days everyone keeps their mobile locked. Munna might be knowing about the unlock sequence but how Makbool can know it. I felt that it should have been a stronger narrative built to establish the relationship. Not sure if I missed but a casual discussion between Akhandanand and Guddu about compounder helping him in Mr Poorvanchal would have built the narrative. Also, it was at odds that there was no mention of touching the tablets by the compounder in some way so that it increases the violence level in Guddu. It comes out only if you are paying too much attention.

Sunday, November 11, 2018

Elections 2019 - Who will win?

To understand how 2019 elections will be fought, let's look back at the run-up for 2014 elections. The story starts a little early. In 2009, UPA govt. unexpectedly got the second stint on power and rather a more comfortable majority compared to 2004 and gave them better control in running the government. Gandhi scion Rahul still not sure if politics is his career and he was happier to remain on the side lanes. Sonia was not keeping well. The other leaders of Congress with the second back to back win were complacent. BJP as an opposition was not as sharp apart from making the parliament to not to function. Anyways, people in power also had no big motivation to sit in parliament day in day out. It suited them.