Sunday, August 31, 2014

एक बूँद

एक बूँद बिछड़ा बादल से
गिरा आसमान से धम्म से
नीचे फैला सारा जहाँ
सोच रहा मन जाऊं कहाँ

एक युगल कर रहा अठखेलियां
गिर जाऊं गाल पर बन जाऊं मोती
मद लिए खड़ा एक आवारा मन
गिर जाऊं जाम पर बन जाऊं हाला

फिर दिखा मुझे एक किसान
कंधे पर हल तपती ज़मीन चेहरा लाल
और दिखा मुझे एक चातक
वर्ष भर की प्यास से बेहाल

चीर दिया मैंने अपने जिस्म को
बाँट दिया दो टुकड़ों में जहाँ
एक गिरा ज़मीन पर दूसरे ने भिगोया कंठ
प्यास बुझाने में रीत गया जीवन

No comments:

Post a Comment